कुछ रंग स्याही के

॥कुछ रंग स्याही के॥

आज के इस रंगीन दुनिया में आप कुछ भी लिखें, कैसा भी लिखें, स्याही का रंग एक सा ही नज़र आता है, काला सा।
फिर उस काले रंग को लोग अपने-अपने हिसाब से बदलने की कोशिश करते हैं। बहुत ज़्यादा नहीं, हल्की-फुल्की कोशिश के बाद बदल भी लेते हैं, कभी नीला, कभी पीला, कभी हरा तो कभी कुछ और। मगर असल रंग कुछ और ही होता है, पंक्तियों के बीच, शब्दों के अंदर, कुछ यादें, कुछ आशाएँ और कुछ भावनाएँ समेटे हुए।

मगर फिर सवाल उठता है कि कौन सा रंग क्या कहता है, क्या सच में काला रंग बुरा और लाल अच्छे को दर्शाता है। क्या पता, हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता।
हो सकता है कि लाल रंग में लिखा संदेश कोई खुशी का संदेश हो या फिर बहुत ही दुख भरा, दिल चीर कर लिखा गया हो, क्योंकि जब दर्द हद से ज़्यादा होता है तो आँखों के साथ साथ कलम भी लहू रिसती है।
और फिर कभी कभी इंसान बहुत ही क्षुब्ध, खिन्न और क्रोधित होता है, तो उसकी स्याही का रंग बहुत ही ज़्यादा स्याह हो जाता है, इतना कि काला रंग भी फीका लगे।
और अगर किसी को इश्क़ हो जाए तो फिर क्या कहना, उसके स्याही में तो माने इन्द्रधनुष के सारे रंग भर गए हों। कभी उसके शब्द नदियों के जैसे नीले रंग से लगते हैं, कभी उगते सूरज सा सुनहरा तो कभी होठों की लाली सरीखा गहरा लाल।
और फिर जो कभी दिल टूट जाए तो उस विरह के समय की स्याही का रंग तो बहुत ही अलग सा हो जाता है, एकदम सूखा सा बिल्कुल ही बेरंग, इतना सादा कि खुली आँखों से दिखे भी न। ऊपर ही ऊपर शब्द तो नज़र आ जाते हैं मगर अंदर के रंग से वाक़िफ़ होना हो तो उन हालातों से भी वाक़िफ़ होना ज़रूरी होता है।
कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनकी स्याही का कोई एक रंग नहीं होता, कई तरह के रंग मिले होते हैं, उलझे से, ठीक उनके ख़यालातों के तरह।
हर किसी के स्याही का रंग एक सा नहीं होता और किसी एक के स्याही का रंग भी हर दफा एक नहीं होता। रंग बदलते रहते हैं ख़यालातों के साथ-साथ।

अब इतने सारे रंग है कि क्या कहूँ, बस इसी उधेड़बुन में दिन निकल जाता है कि मैं कौन-कौन सा रंग लिखता हूँ और लोगों को कौन-कौन सा दिखता होगा।

Post a Comment

0 Comments

Heart touching