एक नमक का दारोगा
----- प्रेमचन्द
भाग- 1
जब नमक का नया विभाग बना और एक ईश्वरदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया , तो लोग चोरी - छिपे इसका व्यापार करने लगे । अनेक प्रकार के छल - प्रपंच का सूत्रपात हुआ- कोई घूस से काम निकालता था , कोई चालाकी से । अधिकारियों के पौ - भारह थे । इसके दारोगा - पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचता था । यह वह समय था जब अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक वस्तु समझते थे । फारसी का प्राबल्य था । फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे । मुंशी वंशीधर भी रोजगार की खोज में निकले । उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे , समझाने लगे- बेटा ! घर की दुर्दशा देख रहे हो । ऋण के बोझ से दबे हुए हैं । अब तुम्ही घर के मालिक मुख्तार हो । नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना । यह तो पीर का मजार है । निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए । ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो । मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और फिर घटते - घटते लुप्त हो जाता है । ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है , जिससे सदैव प्यास बुझती है । वेतन मनुष्य देता है , इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती । ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है , इससे उसमें बरकत होती है । तुम स्वयं विद्वान हो , तुम्हें क्या समझाऊँ ? इस विषय में विवेक की बड़ी आवश्यकता है । मनुष्य को देखो , उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो । इसके उपरान्त जो उचित समझो , करो । गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है । लेकिन बेगरज को दाँव पर लाना जरा कठिन है । इन बातों की गिरह बाँध लो ।
इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया । वंशीधर आज्ञाकारी पर थे । ये बातें ध्यान से सुनी और तब घर से चल पड़े । इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र , बुद्धि अपनी पथ - दर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था । लेकिन अच्छे शकुन से चले थे , जाते - ही - जाते नमक विभाग के दारोगा - पद पर प्रतिष्ठित हो गए । वेतन अच्छा , और ऊपरी आय का तो कुछ गूंगे ठिकाना न था । वृद्ध मुंशीजी को यह सुख - संवाद मिला तो वे फूले न समाए ।
[ भाग-2]
जाड़े का दिन था और रात का समय । नमक के सिपाही , चौकीदार नशे में मस्त पड़े थे । मुंशी वंशीधर को यहाँ आए छह महीनों से अधिक न हुए . लेकिन इस थोड़े समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचरण से अफसरों को मोहित कर लिया था । अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे । नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर यमुना बहती थी । उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था । दारोगाजी किवाड़ बन्द किए मीठी नीद साठे ये । अचानक आँख खुली , तो नदी के प्रवाह की जगह गाड़ियों की गड़गड़ाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया । उठ बैठे। इतनी रात गए गाड़ियाँ वयों नदी के पार जाती है ? अवश्य कुछ - न - कुछ गोलमाल है । बरदी पहनी , तमंचा जेब में रखा और बात - की - यात में घोड़ा बढ़ाए हुए पुल पर आ पहुंचे । गाड़ियों की एक लम्बी कतार देख , डॉटकर पूछा , किसकी गाड़ियाँ है ? थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा । आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई । तब आगेवाले गाड़ीवान ने कहा , पंडित अलोपीदीन की । " कौन पंडित अलोपोदीन ? " " दातागंज के । " मुंशी वंशीधर चौके । पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे बड़े प्रतिष्ठित जमींदार थे । लाखों रुपये का लेन - देन करते थे । इधर छोटे - से - बड़े कौन ऐसे थे जो उनके ऋणी न हो । व्यापार भी बड़ा लम्बा - चौड़ा था । बड़े चलते - पुर्जे आदमी थे । अंग्रेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने जाते और मेहमान होते । बारहों मास सदावत चलता था ।
मुंशीजी ने पूछा , गाड़ियाँ कहाँ जाएंगी ? उत्तर मिला , कानपुर । लेकिन इस प्रसपर कि इसमें क्या है , फिर सन्नाटा छा गया । दारोगा साहब का संदेह और 13 भी बढ़ा । कुछ देर तक उत्तर का बाट देखकर वह जोर से बोले , क्या तुम सब गूंगे हो गए हो ? हम पूछते हैं , इसमें क्या लदा है ? जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला , तो उन्होंने घोड़े को एक गाड़ी से मिलाकर एक बोरे को टटोला । भ्रम दूर हो गया । ये नमक के ढेले थे ।
[भाग- 3 ]
पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार कुछ सोते , कुछ जागते चले आते थे । अचानक कई गाड़ीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले - महाराज ! दारोगा ने गाड़ियाँ रोक दी और घाट पर खड़े आपको बुलाते हैं । पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखण्ड विश्वास था । वे कहा करते थे कि संसार का कहना ही क्या , स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है । उनका यह कथन यथार्थ ही था । न्याय और नीति , सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं । इन्हें वह जैसे चाहती , नचाती है । लेटे - ही - लेटे गर्व से बोले - चलो हम आते हैं । यह कहकर पंडितजी ने बड़ी निश्चिन्तता से पान के बीड़े लगाकर खाए , फिर लिहाफ ओढ़े हुए दारोगा के पास आकर बोले- बाबूजी , आशीर्वाद । कहिए , इसमें ऐसा कौन - सा अपराध हुआ कि गाड़ियाँ रोक दी गई ? हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपादृष्टि ही रहनी चाहिए । वंशीधर रूखाई से बोले- सरकारी हुक्म । पंडित अलोपीदीन ने हँसकर कहा- हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को । हमारे सरकार तो आप ही हैं- हमारा और आपका तो घर का मामला है , हम कभी आप से बाहर हो सकते हैं ? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया । यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढ़ाएँ । मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था । वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहनी वंशी का कुछ प्रभाव न पड़ा । ईमानदारी की नई उमंग थी । कड़ककर बोले- हम उन नमक हरामों में नहीं हैं जो कौड़ियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं । आप इस समय हिरासत में हैं । सबेरे आपका कायदे के अनुसार चालान होगा । बस , मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है । जमादार बदलू सिंह ! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो , मैं हुक्म देता हूँ ।
पंडित अलोपीदीन स्तंभित हो गए । गाड़ीवानों में हलचल मच गई । पंडितजी के जीवन में कदाचित् यह पहला ही अवसर था कि उनको ऐसी कठोर बात सुननी पड़ी । बदलू सिंह आगे बढ़ा , किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड़ सके । पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी नहीं देखा था । विचार किया कि यह अभी उद्दण्ड लड़का है । माया - मोह के जाल में नहीं पड़ा । अल्हड़ है , झिझकता है । बहुत टोन भाव से बोले - बाबू साहब ! ऐसा न कीजिए , हम मिट जाएँगे , इज्जत घूल में मिल जाएगी । हमारा अपमान करने से आपके क्या हाथ आएगा ? हम किसी तरह आपसे बाहर थोड़े ही है ? वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा- हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते । अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था , वह पैरों के नीचे से खिसका हुआ मालूम पड़ा । स्वाभिमान और धन - ऐश्वर्य को कड़ी चोट लगी । किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था । अपने मुख्तार से बोले- लालाजी , एक हजार का नोट बाबू साहब को भेंट करो । आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं । वंशीधर ने गरम होकर कहा , एक हजार नहीं , एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते । धन , धर्म की इस बुद्धिहीन धृष्टता और देव - दुर्लभ त्याग पर बहुत झुंझलाया । अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा । धन ने उछल - उछलकर आक्रमण प्रारम्भ किए । एक से पाँच , पाँच से दस , दस से पन्द्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची ; किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल , अविचलित खड़ा था । आपका अधिकार है । अलोपीदीन निराश होकर बोले , अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं । आगे वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा । बदलू सिंह मन में दारोगाजी को
नमक का दारोगा गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढ़ा । पंडितजी घबराकर दो - तीन कदम पीछे हट गए । अत्यन्त दीनता से बोले- बाबू साहब ! ईश्वर के लिए मुझपर दया कीजिए । मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने को तैयार हूँ । " असम्भव बात है ।
" तीस हजार पर । "
" किसी तरह भी सम्भव नहीं । "
" क्या चालीस हजार पर भी नहीं ? "
" चालीस हजार नहीं , चालीस लाख पर भी असम्भव है । बदलू सिंह ! इस आदमी को अभी हिरासत में ले लो । अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता । " धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला । अलोपीदीन ने एक हृष्ट - पुष्ट मनुष्य को हथकड़ियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा । चारों ओर निराश , कातर दृष्टि से देखने लगे । इसके बाद एकाएक मूर्छित होकर गिर पड़े ।
[भाग- 4]
दुनिया सोती थी , पर दुनिया की जीभ जागती थी । सबेरे ही देखिए , तो बालक - वृद्ध सबके मुँह से वही बात सुनाई देती थी । जिसे देखिए , पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका - टिप्पणी कर रहा था , निन्दा की बौछारें हो रही थीं , मानों संसार से अब पाप का पाश कट गया । पानी को दूध के नाम से बेचनेवाला ग्वाला , कल्पित रोज - नामचे भरनेवाले अधिकारी वर्ग , रेल में बिना टिकट सफ़र करनेवाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साहूकार , ये सब देवताओं की भाँति जी . चला रहे थे । जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर सिपाहियों के साथ हाथों में हथकड़ियाँ , हदय में ग्लानि और क्षोभ भरे , लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले , सारे शहर में हलचल मच गई । मेलों में भी कदाचित आँखें इतनी व्यग्र न होती होंगीं । भीड़ के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा । किन्तु अदालत में पहुँचने की देर थी । पंडित अलोपीदीन उस अगाध वन के सिंह थे । अधिकारी वर्ग उनके भक्त , अमले उनके सेवक , वकील - मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली - चपरासी तो उनके बिना मोल के गुलाम थे । उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौड़े । सभी लोग विस्मित हो रहे थे । इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया , बल्कि इसलिए कि वे कानून के पंजे में कैसे आए ? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो , वह क्यों कानून के पंजे में आए ? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था । बड़ी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों को तैयार किया गया । न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया । वंशीधर चुपचाप खड़े थे । उसके पास सत्य के सिवा न कोई बल था , न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शख । गवाह थे , किन्तु लोभ से डॉवाँडोल । यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर से कुछ खींचा हुआ दीख पड़ता था । वह न्याय का दरवार था , परन्तु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था । किन्तु पक्षपात और न्याय का क्या मेल ? जहाँ पक्षपात हो , वहाँ न्याय की कल्पना भी नहीं की जा सकती । मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया । डिप्टी मैजिस्ट्रेट ने अपनी तजबीज में लिखा - पंडित अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक है । वे एक बड़े भारी आदमी हैं । यह बात कल्पना से बाहर है कि उन्होंने थोड़े - से नमक के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो । यद्यपि नमक के दारोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है , तो भी यह बड़े खेद की बात है कि उसकी उदंडता और अविचार के कारण एक भलेमानस को कष्ट झेलना पड़ा । हम प्रसन्न है कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है , किन्तु नमक के मुहकमे की बढ़ी हुई नमकहलाली ने उसके विवेक और बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया । भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए । वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पड़े । पंडित अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले । स्वजन - बांधवों ने रुपयों की लूट की । उदारता का सागर उमड़ पड़ा । उसकी लहरों ने अदालत की नीव तक हिला दी । जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर से उन पर व्यंग्यवाणों की वर्षा होने लगी । चपरासियों ने झुक झुककर सलाम किए , किन्तु इस समय एक एक कटु वाक्य , एक - एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था । कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वे इस तरह अकड़ते हुए न चलते । आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ । न्याय और विद्वत्ता , लंबी - चौड़ी उपाधियाँ , बड़ी - बड़ी दाढ़ियाँ और ढीले चोंगा, एक भी सच्चे आदर के पात्र नहीं है । बंशोधर ने घर से बैर मोल लिया था , उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था । कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा कार्यपरायणता का दंड मिला । बेचारे भग्न - इदय शोकित और व्यथित घर को चले । पूरे मुशोजी पहले ही कुडबुड़ा रहे थे कि चलते - चलते इस लड़के को समझाया था लेकिन इसने एक न सुनी । बस , मनमानी करता है । हम तो कलार और कसाई के तगादे सहे . बुढ़ापे में भगत बनकर बैठे और वहाँ बस सूखी तनख्वाह । हमने भी तो नौकरी की है । और कोई ओहदेदार नहीं थे , लेकिन जो काम किया दिल खोल कर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं । घर में चाहे अंधेरा रहे मस्जिद में अवश्य चिराग जलाएंगे । खेद ऐसी समझ पर । पड़ना - लिखना सब अकारथ गया । इसके थोड़े ही दिनों बाद , जब मुंशी वंशीधर इस दुरवस्था में घर पहुंचे और बूढ़े पिताजी ने यह समाचार सुना तो सिर पिट लिया । बोले . जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सर फोड़ लूँ । बहुत देर तक पळता - पउताकर हाथ मलते रहे । क्रोध मे कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से रल न जाते . तो अवश्य ही वह क्रोध विकट रूप धारण करता । वृद्धा माता को भी दुख हुआ । जगन्नाथ और रामेश्वर - यात्रा को कामनाएँ मिट्टी में मिल गई । पल्लो ने तो सीधे मुंह से कई दिनों तक बात नहीं की । इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया । संध्या का समय था । बूड़े मुंशीजी बैठे रामनाम की माला फेर रहे थे । इसी समय उनके द्वार पर एक सजा हुआ रथ आकर रुका । हरे और गुलाबी परदे , पछहिए बैलों की जोड़ो , उनकी गर्दनों में नोले धागे , सौग पीतल से जड़े हुए । कई नौकर कंधों पर लाठियाँ रखे साथ थे । मुंशोजो अगुआनी को दौड़े । देखा तो पंडित अलोपोदीन हैं । झुककर दंडवत को और लल्लो - चप्पो की बाते करने लगे - हमारा भाग्य उदय हुआ जो आपके चरण इस द्वार पर आए । आप हमारे पूज्य देवता हैं आपको कौन - सा मुँह दिखाएं , मुंह में तो कालिख लगी हुई है । किन्तु क्या करें , लड़का अभागा कपूत है , नहीं तो आपसे मुँह छिपाना पड़ता? ईश्वर निस्संतान चाहें रखे , पर ऐसी संतान न दे । अलोपीदीन ने कहा , नहीं भाई साहब , ऐसा न कहिए । मुंशीजी ने चकित होकर कहा , ऐसी संतान को और कया कहूँ?
अलोपोदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर कहा , कुल - तिलक और पुरखों की कीर्ति उज्ज्वल करनेवाले संसार में कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं , जो धर्म पर अपना सबकुछ अर्पण कर सकें । पं ० अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा , दारोगाजी , इसे खुशामद न समझिए , खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी । उस रात को आपने अपने अधिकारबल से मुझे अपनी हिरासत में लिया था ; किन्तु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ । मैंने हजारों रईस और अमीर देखे , हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पड़ा , किन्तु मुझे परास्त किया तो आपने । मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड़ दिया । मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूं । वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया ; किन्तु स्वाभिमान - सहित । समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं । क्षमा - प्रार्थना की चेष्टा नहीं की , वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असहा - सी प्रतीत हुई । पर पंडितजी की बातें सुनी , तो मन का मैल मिट गया । पंडितजी की ओर उड़ती हुई दृष्टि से देखा । सद्भाव झलक रहा था । गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया । शमति हुए बोले- यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं । मुझसे जो अविनय हुई है , उसे क्षमा कीजिए । मैं धर्म को बेड़ी में जकड़ा हुआ था । नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ । जो आज्ञा होगी , वह सिर माथे पर । अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- नदी के तट पर आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार न की थी , किन्तु आज स्वीकार करनी पड़ेगी । वंशीधर बोले- मैं किस योग्य हूँ । किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है , उसमें त्रुटि न होगी । अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले - इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए । मैं ब्राह्मण हूँ , जब तक सवाल पूरा न कीजिएगा , द्वार से न हदूँगा । मुंशी बंधीधर ने उस कागज को पढ़ा तो कृतज्ञता से आँसू भर आए ।
पंडित अलोपीदीन ने उन्हें अपनी सारी जायदाद का स्थायी प्रबंधक नियुक्त किया था । छह हजार वार्षिक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग , सवारी के लिए घोड़े , रहने को बंगला , नौकर - चाकर मुफ्त । वंशीधर कंपित स्वर में बोले पंडितजी , मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी इस उदारता की प्रशंसा कर सकूँ । किन्तु मैं ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ । अलोपीदीन हँसकर बोले- मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है । - वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- यों मैं आपका दास हूँ । आप जैसे कीर्तिवान सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है । किंतु मुझमें न विद्या है , न वह अनुभव , जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है । ऐसे महान् कार्य के लिए एक बड़ा मर्मज्ञ , अनुभवी मनुष्य की जरूरत है । अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- मुझे न विद्वत्ता की चाह है , न अनुभव की ; न मर्मज्ञता की , न कार्यकुशलता की । इन गुणों के महत्त्व का परिचय खूब पा चुका हूँ । अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया है , जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड़ जाती है । यह कलम लीजिए , अधिक सोच - विचार न कीजिए , दस्तखत कर दीजिए । परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव उसी नदी के किनारेवाला बेमुरौवत , उदंड , परन्तु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे । वंशीधर की आँखें डबडबा गई । हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका । एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा से देखा और काँपते हुए हाथ से प्रबंधकी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए । अलोपीदीन ने प्रफुल्ल होकर उन्हें गले लगा लिया
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----- प्रेमचन्द
भाग- 1
जब नमक का नया विभाग बना और एक ईश्वरदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया , तो लोग चोरी - छिपे इसका व्यापार करने लगे । अनेक प्रकार के छल - प्रपंच का सूत्रपात हुआ- कोई घूस से काम निकालता था , कोई चालाकी से । अधिकारियों के पौ - भारह थे । इसके दारोगा - पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचता था । यह वह समय था जब अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक वस्तु समझते थे । फारसी का प्राबल्य था । फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे । मुंशी वंशीधर भी रोजगार की खोज में निकले । उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे , समझाने लगे- बेटा ! घर की दुर्दशा देख रहे हो । ऋण के बोझ से दबे हुए हैं । अब तुम्ही घर के मालिक मुख्तार हो । नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना । यह तो पीर का मजार है । निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए । ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो । मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और फिर घटते - घटते लुप्त हो जाता है । ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है , जिससे सदैव प्यास बुझती है । वेतन मनुष्य देता है , इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती । ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है , इससे उसमें बरकत होती है । तुम स्वयं विद्वान हो , तुम्हें क्या समझाऊँ ? इस विषय में विवेक की बड़ी आवश्यकता है । मनुष्य को देखो , उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो । इसके उपरान्त जो उचित समझो , करो । गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है । लेकिन बेगरज को दाँव पर लाना जरा कठिन है । इन बातों की गिरह बाँध लो ।
इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया । वंशीधर आज्ञाकारी पर थे । ये बातें ध्यान से सुनी और तब घर से चल पड़े । इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र , बुद्धि अपनी पथ - दर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था । लेकिन अच्छे शकुन से चले थे , जाते - ही - जाते नमक विभाग के दारोगा - पद पर प्रतिष्ठित हो गए । वेतन अच्छा , और ऊपरी आय का तो कुछ गूंगे ठिकाना न था । वृद्ध मुंशीजी को यह सुख - संवाद मिला तो वे फूले न समाए ।
[ भाग-2]
जाड़े का दिन था और रात का समय । नमक के सिपाही , चौकीदार नशे में मस्त पड़े थे । मुंशी वंशीधर को यहाँ आए छह महीनों से अधिक न हुए . लेकिन इस थोड़े समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचरण से अफसरों को मोहित कर लिया था । अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे । नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर यमुना बहती थी । उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था । दारोगाजी किवाड़ बन्द किए मीठी नीद साठे ये । अचानक आँख खुली , तो नदी के प्रवाह की जगह गाड़ियों की गड़गड़ाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया । उठ बैठे। इतनी रात गए गाड़ियाँ वयों नदी के पार जाती है ? अवश्य कुछ - न - कुछ गोलमाल है । बरदी पहनी , तमंचा जेब में रखा और बात - की - यात में घोड़ा बढ़ाए हुए पुल पर आ पहुंचे । गाड़ियों की एक लम्बी कतार देख , डॉटकर पूछा , किसकी गाड़ियाँ है ? थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा । आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई । तब आगेवाले गाड़ीवान ने कहा , पंडित अलोपीदीन की । " कौन पंडित अलोपोदीन ? " " दातागंज के । " मुंशी वंशीधर चौके । पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे बड़े प्रतिष्ठित जमींदार थे । लाखों रुपये का लेन - देन करते थे । इधर छोटे - से - बड़े कौन ऐसे थे जो उनके ऋणी न हो । व्यापार भी बड़ा लम्बा - चौड़ा था । बड़े चलते - पुर्जे आदमी थे । अंग्रेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने जाते और मेहमान होते । बारहों मास सदावत चलता था ।
मुंशीजी ने पूछा , गाड़ियाँ कहाँ जाएंगी ? उत्तर मिला , कानपुर । लेकिन इस प्रसपर कि इसमें क्या है , फिर सन्नाटा छा गया । दारोगा साहब का संदेह और 13 भी बढ़ा । कुछ देर तक उत्तर का बाट देखकर वह जोर से बोले , क्या तुम सब गूंगे हो गए हो ? हम पूछते हैं , इसमें क्या लदा है ? जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला , तो उन्होंने घोड़े को एक गाड़ी से मिलाकर एक बोरे को टटोला । भ्रम दूर हो गया । ये नमक के ढेले थे ।
[भाग- 3 ]
पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार कुछ सोते , कुछ जागते चले आते थे । अचानक कई गाड़ीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले - महाराज ! दारोगा ने गाड़ियाँ रोक दी और घाट पर खड़े आपको बुलाते हैं । पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखण्ड विश्वास था । वे कहा करते थे कि संसार का कहना ही क्या , स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है । उनका यह कथन यथार्थ ही था । न्याय और नीति , सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं । इन्हें वह जैसे चाहती , नचाती है । लेटे - ही - लेटे गर्व से बोले - चलो हम आते हैं । यह कहकर पंडितजी ने बड़ी निश्चिन्तता से पान के बीड़े लगाकर खाए , फिर लिहाफ ओढ़े हुए दारोगा के पास आकर बोले- बाबूजी , आशीर्वाद । कहिए , इसमें ऐसा कौन - सा अपराध हुआ कि गाड़ियाँ रोक दी गई ? हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपादृष्टि ही रहनी चाहिए । वंशीधर रूखाई से बोले- सरकारी हुक्म । पंडित अलोपीदीन ने हँसकर कहा- हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को । हमारे सरकार तो आप ही हैं- हमारा और आपका तो घर का मामला है , हम कभी आप से बाहर हो सकते हैं ? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया । यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढ़ाएँ । मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था । वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहनी वंशी का कुछ प्रभाव न पड़ा । ईमानदारी की नई उमंग थी । कड़ककर बोले- हम उन नमक हरामों में नहीं हैं जो कौड़ियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं । आप इस समय हिरासत में हैं । सबेरे आपका कायदे के अनुसार चालान होगा । बस , मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है । जमादार बदलू सिंह ! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो , मैं हुक्म देता हूँ ।
पंडित अलोपीदीन स्तंभित हो गए । गाड़ीवानों में हलचल मच गई । पंडितजी के जीवन में कदाचित् यह पहला ही अवसर था कि उनको ऐसी कठोर बात सुननी पड़ी । बदलू सिंह आगे बढ़ा , किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड़ सके । पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी नहीं देखा था । विचार किया कि यह अभी उद्दण्ड लड़का है । माया - मोह के जाल में नहीं पड़ा । अल्हड़ है , झिझकता है । बहुत टोन भाव से बोले - बाबू साहब ! ऐसा न कीजिए , हम मिट जाएँगे , इज्जत घूल में मिल जाएगी । हमारा अपमान करने से आपके क्या हाथ आएगा ? हम किसी तरह आपसे बाहर थोड़े ही है ? वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा- हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते । अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था , वह पैरों के नीचे से खिसका हुआ मालूम पड़ा । स्वाभिमान और धन - ऐश्वर्य को कड़ी चोट लगी । किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था । अपने मुख्तार से बोले- लालाजी , एक हजार का नोट बाबू साहब को भेंट करो । आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं । वंशीधर ने गरम होकर कहा , एक हजार नहीं , एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते । धन , धर्म की इस बुद्धिहीन धृष्टता और देव - दुर्लभ त्याग पर बहुत झुंझलाया । अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा । धन ने उछल - उछलकर आक्रमण प्रारम्भ किए । एक से पाँच , पाँच से दस , दस से पन्द्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची ; किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल , अविचलित खड़ा था । आपका अधिकार है । अलोपीदीन निराश होकर बोले , अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं । आगे वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा । बदलू सिंह मन में दारोगाजी को
नमक का दारोगा गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढ़ा । पंडितजी घबराकर दो - तीन कदम पीछे हट गए । अत्यन्त दीनता से बोले- बाबू साहब ! ईश्वर के लिए मुझपर दया कीजिए । मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने को तैयार हूँ । " असम्भव बात है ।
" तीस हजार पर । "
" किसी तरह भी सम्भव नहीं । "
" क्या चालीस हजार पर भी नहीं ? "
" चालीस हजार नहीं , चालीस लाख पर भी असम्भव है । बदलू सिंह ! इस आदमी को अभी हिरासत में ले लो । अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता । " धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला । अलोपीदीन ने एक हृष्ट - पुष्ट मनुष्य को हथकड़ियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा । चारों ओर निराश , कातर दृष्टि से देखने लगे । इसके बाद एकाएक मूर्छित होकर गिर पड़े ।
[भाग- 4]
दुनिया सोती थी , पर दुनिया की जीभ जागती थी । सबेरे ही देखिए , तो बालक - वृद्ध सबके मुँह से वही बात सुनाई देती थी । जिसे देखिए , पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका - टिप्पणी कर रहा था , निन्दा की बौछारें हो रही थीं , मानों संसार से अब पाप का पाश कट गया । पानी को दूध के नाम से बेचनेवाला ग्वाला , कल्पित रोज - नामचे भरनेवाले अधिकारी वर्ग , रेल में बिना टिकट सफ़र करनेवाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साहूकार , ये सब देवताओं की भाँति जी . चला रहे थे । जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर सिपाहियों के साथ हाथों में हथकड़ियाँ , हदय में ग्लानि और क्षोभ भरे , लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले , सारे शहर में हलचल मच गई । मेलों में भी कदाचित आँखें इतनी व्यग्र न होती होंगीं । भीड़ के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा । किन्तु अदालत में पहुँचने की देर थी । पंडित अलोपीदीन उस अगाध वन के सिंह थे । अधिकारी वर्ग उनके भक्त , अमले उनके सेवक , वकील - मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली - चपरासी तो उनके बिना मोल के गुलाम थे । उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौड़े । सभी लोग विस्मित हो रहे थे । इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया , बल्कि इसलिए कि वे कानून के पंजे में कैसे आए ? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो , वह क्यों कानून के पंजे में आए ? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था । बड़ी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों को तैयार किया गया । न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया । वंशीधर चुपचाप खड़े थे । उसके पास सत्य के सिवा न कोई बल था , न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शख । गवाह थे , किन्तु लोभ से डॉवाँडोल । यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर से कुछ खींचा हुआ दीख पड़ता था । वह न्याय का दरवार था , परन्तु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था । किन्तु पक्षपात और न्याय का क्या मेल ? जहाँ पक्षपात हो , वहाँ न्याय की कल्पना भी नहीं की जा सकती । मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया । डिप्टी मैजिस्ट्रेट ने अपनी तजबीज में लिखा - पंडित अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक है । वे एक बड़े भारी आदमी हैं । यह बात कल्पना से बाहर है कि उन्होंने थोड़े - से नमक के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो । यद्यपि नमक के दारोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है , तो भी यह बड़े खेद की बात है कि उसकी उदंडता और अविचार के कारण एक भलेमानस को कष्ट झेलना पड़ा । हम प्रसन्न है कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है , किन्तु नमक के मुहकमे की बढ़ी हुई नमकहलाली ने उसके विवेक और बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया । भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए । वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पड़े । पंडित अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले । स्वजन - बांधवों ने रुपयों की लूट की । उदारता का सागर उमड़ पड़ा । उसकी लहरों ने अदालत की नीव तक हिला दी । जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर से उन पर व्यंग्यवाणों की वर्षा होने लगी । चपरासियों ने झुक झुककर सलाम किए , किन्तु इस समय एक एक कटु वाक्य , एक - एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था । कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वे इस तरह अकड़ते हुए न चलते । आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ । न्याय और विद्वत्ता , लंबी - चौड़ी उपाधियाँ , बड़ी - बड़ी दाढ़ियाँ और ढीले चोंगा, एक भी सच्चे आदर के पात्र नहीं है । बंशोधर ने घर से बैर मोल लिया था , उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था । कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा कार्यपरायणता का दंड मिला । बेचारे भग्न - इदय शोकित और व्यथित घर को चले । पूरे मुशोजी पहले ही कुडबुड़ा रहे थे कि चलते - चलते इस लड़के को समझाया था लेकिन इसने एक न सुनी । बस , मनमानी करता है । हम तो कलार और कसाई के तगादे सहे . बुढ़ापे में भगत बनकर बैठे और वहाँ बस सूखी तनख्वाह । हमने भी तो नौकरी की है । और कोई ओहदेदार नहीं थे , लेकिन जो काम किया दिल खोल कर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं । घर में चाहे अंधेरा रहे मस्जिद में अवश्य चिराग जलाएंगे । खेद ऐसी समझ पर । पड़ना - लिखना सब अकारथ गया । इसके थोड़े ही दिनों बाद , जब मुंशी वंशीधर इस दुरवस्था में घर पहुंचे और बूढ़े पिताजी ने यह समाचार सुना तो सिर पिट लिया । बोले . जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सर फोड़ लूँ । बहुत देर तक पळता - पउताकर हाथ मलते रहे । क्रोध मे कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से रल न जाते . तो अवश्य ही वह क्रोध विकट रूप धारण करता । वृद्धा माता को भी दुख हुआ । जगन्नाथ और रामेश्वर - यात्रा को कामनाएँ मिट्टी में मिल गई । पल्लो ने तो सीधे मुंह से कई दिनों तक बात नहीं की । इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया । संध्या का समय था । बूड़े मुंशीजी बैठे रामनाम की माला फेर रहे थे । इसी समय उनके द्वार पर एक सजा हुआ रथ आकर रुका । हरे और गुलाबी परदे , पछहिए बैलों की जोड़ो , उनकी गर्दनों में नोले धागे , सौग पीतल से जड़े हुए । कई नौकर कंधों पर लाठियाँ रखे साथ थे । मुंशोजो अगुआनी को दौड़े । देखा तो पंडित अलोपोदीन हैं । झुककर दंडवत को और लल्लो - चप्पो की बाते करने लगे - हमारा भाग्य उदय हुआ जो आपके चरण इस द्वार पर आए । आप हमारे पूज्य देवता हैं आपको कौन - सा मुँह दिखाएं , मुंह में तो कालिख लगी हुई है । किन्तु क्या करें , लड़का अभागा कपूत है , नहीं तो आपसे मुँह छिपाना पड़ता? ईश्वर निस्संतान चाहें रखे , पर ऐसी संतान न दे । अलोपीदीन ने कहा , नहीं भाई साहब , ऐसा न कहिए । मुंशीजी ने चकित होकर कहा , ऐसी संतान को और कया कहूँ?
अलोपोदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर कहा , कुल - तिलक और पुरखों की कीर्ति उज्ज्वल करनेवाले संसार में कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं , जो धर्म पर अपना सबकुछ अर्पण कर सकें । पं ० अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा , दारोगाजी , इसे खुशामद न समझिए , खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी । उस रात को आपने अपने अधिकारबल से मुझे अपनी हिरासत में लिया था ; किन्तु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ । मैंने हजारों रईस और अमीर देखे , हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पड़ा , किन्तु मुझे परास्त किया तो आपने । मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड़ दिया । मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूं । वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया ; किन्तु स्वाभिमान - सहित । समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं । क्षमा - प्रार्थना की चेष्टा नहीं की , वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असहा - सी प्रतीत हुई । पर पंडितजी की बातें सुनी , तो मन का मैल मिट गया । पंडितजी की ओर उड़ती हुई दृष्टि से देखा । सद्भाव झलक रहा था । गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया । शमति हुए बोले- यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं । मुझसे जो अविनय हुई है , उसे क्षमा कीजिए । मैं धर्म को बेड़ी में जकड़ा हुआ था । नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ । जो आज्ञा होगी , वह सिर माथे पर । अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- नदी के तट पर आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार न की थी , किन्तु आज स्वीकार करनी पड़ेगी । वंशीधर बोले- मैं किस योग्य हूँ । किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है , उसमें त्रुटि न होगी । अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले - इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए । मैं ब्राह्मण हूँ , जब तक सवाल पूरा न कीजिएगा , द्वार से न हदूँगा । मुंशी बंधीधर ने उस कागज को पढ़ा तो कृतज्ञता से आँसू भर आए ।
पंडित अलोपीदीन ने उन्हें अपनी सारी जायदाद का स्थायी प्रबंधक नियुक्त किया था । छह हजार वार्षिक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग , सवारी के लिए घोड़े , रहने को बंगला , नौकर - चाकर मुफ्त । वंशीधर कंपित स्वर में बोले पंडितजी , मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी इस उदारता की प्रशंसा कर सकूँ । किन्तु मैं ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ । अलोपीदीन हँसकर बोले- मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है । - वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- यों मैं आपका दास हूँ । आप जैसे कीर्तिवान सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है । किंतु मुझमें न विद्या है , न वह अनुभव , जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है । ऐसे महान् कार्य के लिए एक बड़ा मर्मज्ञ , अनुभवी मनुष्य की जरूरत है । अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- मुझे न विद्वत्ता की चाह है , न अनुभव की ; न मर्मज्ञता की , न कार्यकुशलता की । इन गुणों के महत्त्व का परिचय खूब पा चुका हूँ । अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया है , जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड़ जाती है । यह कलम लीजिए , अधिक सोच - विचार न कीजिए , दस्तखत कर दीजिए । परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव उसी नदी के किनारेवाला बेमुरौवत , उदंड , परन्तु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे । वंशीधर की आँखें डबडबा गई । हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका । एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा से देखा और काँपते हुए हाथ से प्रबंधकी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए । अलोपीदीन ने प्रफुल्ल होकर उन्हें गले लगा लिया
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